अभी मात्र एक आलेख पढ़ा। मैं देर रात या भोर वेला कुछ नहीं पढ़ता, लेकिन इस आलेख पर नजर पड़ी तो तो अपने को रोक नहीं पाया। बहुत ही सार्थक और विवेचनीय आलेख। हार्दिक बधाई।इसे एक बार नहीं कई बार पढ़ने की जरूरत है।
बेहतरीन प्रयास । एक रचनाकार अगर स्वयं के सृजन को आलोचक,समालोचक या समीक्षक की दृष्टि से देखे तो बहुत सी भ्रांतियों का निवारण सँभव है। यह एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। बधाई तो बनती है।
अभी मात्र एक आलेख पढ़ा। मैं देर रात या भोर वेला कुछ नहीं पढ़ता, लेकिन इस आलेख पर नजर पड़ी तो तो अपने को रोक नहीं पाया। बहुत ही सार्थक और विवेचनीय आलेख।
ReplyDeleteहार्दिक बधाई।इसे एक बार नहीं कई बार पढ़ने की जरूरत है।
हार्दिक आभार सर.
Deleteबहुत सराहनीय,मौलिक व सटीक प्रयास।रचनाओं की दौड़ के बीच ऐसा विश्लेषण एक सच्चे रचनाकार के मार्ग को निर्देशित करेगा पूर्ण विश्वास है।
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका.
Deleteभाई चंद्रेश जी, यदि आप मुझे इसकी टेक्स्ट/वर्ड फ़ाइल उपलध करवा दें तो इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने पर विचार किया जा सकता है.
ReplyDeleteजी ज़रूर सर.
Deleteबेहतरीन प्रयास । एक रचनाकार अगर स्वयं के सृजन को आलोचक,समालोचक या समीक्षक की दृष्टि से देखे तो बहुत सी भ्रांतियों का निवारण सँभव है। यह एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। बधाई तो बनती है।
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका.
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