मेरी कमज़ोर लघुकथा । ई-पुस्तक । सम्पादक: डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी

 

Comments

  1. अभी मात्र एक आलेख पढ़ा। मैं देर रात या भोर वेला कुछ नहीं पढ़ता, लेकिन इस आलेख पर नजर पड़ी तो तो अपने को रोक नहीं पाया। बहुत ही सार्थक और विवेचनीय आलेख।
    हार्दिक बधाई।इसे एक बार नहीं कई बार पढ़ने की जरूरत है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार सर.

      Delete
  2. बहुत सराहनीय,मौलिक व सटीक प्रयास।रचनाओं की दौड़ के बीच ऐसा विश्लेषण एक सच्चे रचनाकार के मार्ग को निर्देशित करेगा पूर्ण विश्वास है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आपका.

      Delete
  3. भाई चंद्रेश जी, यदि आप मुझे इसकी टेक्स्ट/वर्ड फ़ाइल उपलध करवा दें तो इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने पर विचार किया जा सकता है.

    ReplyDelete
  4. बेहतरीन प्रयास । एक रचनाकार अगर स्वयं के सृजन को आलोचक,समालोचक या समीक्षक की दृष्टि से देखे तो बहुत सी भ्रांतियों का निवारण सँभव है। यह एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। बधाई तो बनती है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आपका.

      Delete

Post a Comment